क्या-बच्चे की गवाही पर किसी को मर्डर के लिए सजा हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस

भारत या दुनिया में कहीं भी न्यायिक कार्यवाही गवाहों और सबूतों के बिना अधूरी है क्योंकि गवाह सबूत का पहला आधार होता है। गवाह वो व्यक्ति होता है जो संबंधित तथ्यों और मामले के बारे में अदालत के समक्ष शपथ के तहत गवाही देता है। आपको बता दे कि गवाह कई प्रकार के होते हैं और भारत में कानून ने सक्षम गवाह के लिए कोई आयु सीमा निर्धारित या मान्यता नहीं दी है की इस उम्र का व्यक्ति गवाह दे सकता है। अदालतों और मुकदमों में गवाहों को लेकर अक्सर जो सवाल उठता है वह उनकी योग्यता को लेकर ही उठता है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 में कुछ नियम दिए हुए है, लेकिन उतने स्पष्ट और व्यापक नहीं, जितने जरूरी हैं कि कौन अदालत में गवाही देने के लिए पर्याप्त रूप से सक्षम है। इसमें कहा गया है, "सभी व्यक्ति गवाही देने के लिए सक्षम होंगे जब तक कि न्यायालय यह नहीं मानता कि उन्हें उनसे पूछे गए प्रश्नों को समझने से रोका गया है।

 
ट्रायल कोर्ट ने एक बच्चे की गवाही पर एक व्यक्ति को धारा 302 के तहत सजा सुनाई थी तो जब ये मामला सुप्रीम कोर्ट में गया तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि क्या ट्रायल कोर्ट ने इस चीज की जांच की थी कि बच्चा गवाही दे रहा है उससे ये पूछा गया था कि जब मर्डर हुआ तब बच्चा कहाँ पर खड़ा था , क्या उसने उस व्यक्ति का मर्डर करते हुए देखा था। यहां पर आपको बता दे कि जब बड़ा व्यक्ति न्यायालय में गवाही देता है तो न्यायालय एवं उसको लगता है कि मेरी गवाही की कोई वैल्यू हो सकती है की मेरी गवाही सत्य मानी जायेगी या उसे लगता है कि मेरी गवाही देने से कोई इंसान जेल जा सकता है या कोई इंसान झूठा साबित हो सकता है।
 
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि जब बच्चे को कठघरे में खड़ा किया जाता है तो क्या उससे सच बोलने की उम्मीद की जाती है क्योंकि वो तो बच्चा है उसमे ऐसा लगता है कि उस बच्चे को किसी ने बहका दिया होगा या फिर कुछ सीखा दिया होगा। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब बच्चे की गवाही ली जाए गो उसका प्रथम परीक्षण करना बहुत जरूरी है। इसमे उससे पूछा जाए कि क्या वो गवाही देने में सक्षम है या नही । सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट को अपने साक्ष्य दर्ज करने से पहले नाबालिग गवाहों की उचित प्रारंभिक जांच करनी होगी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि क्या नाबालिग उससे पूछे गए प्रश्नों को समझने में सक्षम है और तर्कसंगत उत्तर देने में सक्षम है।
 
आपको बता दे कि सत्र न्यायालय ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 34 के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 302 और आईपीसी की धारा 34 के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 449 और 324 के तहत दोषी ठहराया था। दोषसिद्धि, जिसके बाद में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने इस फैसले को बरकरार रखा था , इसका मुख्य रूप से एक नाबालिग गवाह की गवाही पर आधारित थी। उच्च अदालत के समक्ष आरोपी ने दलील दी कि नाबालिग गवाह की गवाही की बिल्कुल भी पुष्टि नहीं हुई है। जो भौतिक विरोधाभासों और सुधारों से भरी है और उसके साक्ष्य विश्वसनीय नहीं हैं।
 
यहां पर जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस राजेश बिंदल की पीठ ने कहा कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 की आवश्यकता के अनुसार , ट्रायल जज का यह कर्तव्य है कि वह अपनी राय दर्ज करे कि बच्चा उससे पूछे गए सवालों को समझने में सक्षम है और वह वह उससे पूछे गए प्रश्नों का तर्कसंगत उत्तर देने में सक्षम है। बच्चा सब बातें बताने के योग्य है या नही , या बच्चा घटना स्थल पर मौजूद था या नही। ट्रायल जज को अपनी राय भी दर्ज करनी चाहिए कि बच्चा गवाह सच बोलने के कर्तव्य को समझता है और यह भी बताना चाहिए कि उसकी राय क्यों है कि बच्चा सच बोलने के कर्तव्य को समझता है। अदालत ने इस फैसले को उसमे जोड़ दिया था।
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बाल गवाह- का दायरा और विश्वसनीयता बाल गवाह वह व्यक्ति होता है जिसकी गवाही देने और गवाही देने के समय उम्र अठारह वर्ष से कम होती है। आपको यहां पर बता दे कि जो बच्चे होते है वो अक्सर सबसे खतरनाक गवाह होते हैं, क्योंकि उन्हें आसानी से पढ़ाया या सिखाया जा सकता है और इसलिए उन्हें बड़ों के हाथों की कठपुतली की तरह खेला जाता है। लेकिन बड़े इंसान को कुछ सिखाया या पढ़ाया नही जा सकता है। इसलिए गवाही पर हमेशा तभी भरोसा किया जाना चाहिए जब न्यायाधीश यह दर्ज कर दे कि बच्चा गवाही देने के लिए पर्याप्त रूप से फिट है और इसके लिए पुष्टिकारक साक्ष्य भी हैं, लेकिन आपको बता दे कि सभी प्रकार के मामलों में पुष्टिकारक साक्ष्य आवश्यक नहीं होता है।
 
यहां पर एक मामला है कि इंदौर में अदालत ने एक अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने 7 साल की बच्ची की हत्या के दोषी पाए गए सद्दाम को फांसी की सजा सुनाई है। इसमे भी एक बच्चे ने ही अपनी गवाही दी थी। आपको बता दे कि यहां सद्दाम ने बच्ची को गलत नीयत से उठाया था और तो और विरोध करने पर उसने बच्ची पर चाकू से ताबड़तोड़ हमला कर दिया था। जिसमें बच्ची की वही पर मौत हो गयी थी।
 
घर के बाहर आंगन में खेल रही मासूम के हत्यारे को कोर्ट ने चार महीने के अंदर ही सुनवाई पूरी करके फांसी की सजा दी थी। आपको यहां पर ये भी बता दे कि दोषी के परिवार ने उसे मानसिक विक्षिप्त बताने की भी बहुत कोशिश की थी। लेकिन वही कोर्ट ने सुनवाई के दौरान उसे पूर्ण रूप से स्वस्थ माना था। आपको बता दे कि इस केस में 12 साल के ही एक मासूम की गवाही अहम साबित हुई। इसका भी प्रथम तौर पर परीक्षण किया गया था। उसने निडरता से कोर्ट के सामने गवाही दी थी। इस अपराध को विरल से विरलतम माना और सद्दाम को मृत्युदंड की सजा सुनाई थी।

बच्चे ने दी थी गवाही
आपको बता दे कि आज़ाद नगर थाना पुलिस ने घटना के तुरंत बाद केस दर्ज करके मामले की जांच शुरू कर दी थी।  लेकिन लगभग तोर पर 15 दिन में मामले की विवेचना पूरी करके 7 अक्टूबर को चालान कोर्ट में पेश कर दिया था। आपको बता दे कि यहां पर पुलिस ने इस मामले में जांच के दौरान 23 गवाह बनाए थे।  जिन्होंने कोर्ट में गवाही दी। आपको बता दे कि इन गवाहों में एक 12 साल का बच्चा भी शामिल है जो घटना से कुछ समय पहले तक मृतका ( जिसको मार दिया गया था ) के साथ ही खेल रहा था। यहां पर कोर्ट ने मासूम की गवाही को ही अहम माना है। अदालत में लगभग एक महीने के अंदर 23 गवाहों की गवाही हुई थी। इसके दौरान आरोपी पक्ष की तरफ से भी दो बचाव साक्षियों ने कोर्ट में गवाही दी। कोर्ट ने प्रकरण में सुनवाई के बाद 31 जनवरी को आरोपी पर लगे दोषों को सही पाया और फिर 6 फरवरी को फैसला सुना दिया गया था।
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